नई दिल्ली — मंगलवार को पीटीआई न्यूज़ द्वारा प्रकाशित एक अर्थशास्त्रियों के सर्वेक्षण के अनुसार, भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) अक्टूबर की शुरुआत में निर्धारित मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक में अपनी रेपो दर को 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.5 प्रतिशत करने की संभावना है। विश्लेषकों का कहना है कि अपेक्षित इस कदम के प्रमुख कारक持नीय मुद्रास्फीति, बढ़ते क्रूड ऑयल के दाम और पश्चिम एशियाई संकट से उत्पन्न परिणाम हैं।
वर्तमान नीति रुख और मुद्रास्फीति का पृष्ठभूमि
मार्च 2026 की बैठक के बाद से आरबीआई ने रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रखा है, जो 2022 में शुरू हुए 75 बेसिस पॉइंट के लगातार वृद्धि के क्रम का हिस्सा था। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति मध्यम अवधि के 4 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है और हाल के आंकड़ों में यह लगभग 5 प्रतिशत के आसपास है। केंद्रीय बैंक ने चेतावनी दी है कि बाहरी झटके मूल्य दबावों को ऊंचे स्तर पर बनाए रख सकते हैं।
मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष से जुड़े आपूर्ति व्यवधानों के कारण जून 2026 के बाद से क्रूड ऑयल के दामों में तेजी आई है। ब्लूमबर्ग द्वारा संकलित बाजार डेटा के अनुसार, ब्रेंट क्रूड का मूल्य मई में प्रति बैरल 78 डॉलर से बढ़कर सितंबर की शुरुआत में प्रति बैरल 92 डॉलर तक पहुंच गया। ऊंचे तेल के खर्च परिवहन और निर्माण लागत में जुड़ते हैं, जिससे शीर्ष स्तर की मुद्रास्फीति (हेडलाइन इंफ्लेशन) में वृद्धि होती है।
पश्चिम एशियाई संकट और वैश्विक ब्याज दरों की गतिशीलता
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक वस्तु बाजारों में अनिश्चितता को बढ़ा दिया है। विश्लेषकों का कहना है कि चल रहे संघर्ष ने क्षेत्रीय तेल उत्पादन को कम कर दिया है और नौवहन मार्गों को कठोर बना दिया है, जिससे एक जोखिम प्रीमियम (रिस्क प्रीमियम) पैदा हुआ है जो वैश्विक तेल के दामों को ऊपर धकेल रहा है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के नवीनतम विश्व आर्थिक परिदृश्य (वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक) के अनुमान के अनुसार, इस वर्ष तेल की कीमतों में झटके उभरती अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति को 0.2 प्रतिशत पॉइंट तक बढ़ा सकते हैं।
इसी समय, अमेरिकी फेडरल रिज़र्व और यूरोपीय केंद्रीय बैंक जैसे प्रमुख केंद्रीय बैंकों ने आगे की कठोरता (टाइटनिंग) का संकेत दिया है। जुलाई 2026 में वृद्धि के बाद फेड की नीतिगत दर 5.25 प्रतिशत पर है, जबकि ईसीबी की मुख्य पुनर्वित्तपोषण दर (मेन रिफाइनेंसिंग रेट) 4.0 प्रतिशत है। आरबीआई ने संकेत दिया है कि वह वैश्विक मौद्रिक स्थितियों की नज़दीकी निगरानी करेगा, क्योंकि पूंजी प्रवाह और रुपये का विनिमय दर विदेशी ब्याज दरों के अंतर के प्रति संवेदनशील हैं।
विशेषज्ञों का सर्वेक्षण और बाजार की अपेक्षाएं
पीटीआई के सर्वेक्षण में 12 वरिष्ठ अर्थशास्त्रियों और बाजार रणनीतिकारों से बात की गई। दस प्रतिकारकों ने 25 बेसिस पॉइंट की वृद्धि की उम्मीद जताई, जबकि दो ने कोई बदलाव नहीं होने का अनुमान लगाया। यह सहमति दक्कन हेराल्ड के विश्लेषण से मेल खाती है, जिसमें कहा गया है कि आरबीआई मुद्रास्फीति में आगे की वृद्धि को रोकने के लिए रेपो दर को 5.5 प्रतिशत तक बढ़ा सकता है।
बॉन्ड बाजार के प्रतिभागियों ने पहले ही एक मामूली वृद्धि को मूल्य में समाहित कर लिया है। 10‑वर्षीय सरकारी बांड पर यील्ड अक्टूबर की शुरुआत में 7.15% तक बढ़ गई, जो एक सप्ताह पहले के 7.05% से ऊपर है, और यह सख्त नीति की अपेक्षाओं को दर्शाता है।
उधारकर्ताओं और निवेशकों के लिए निहितार्थ
दर में वृद्धि से परिवारों और व्यवसायों के लिए उधारी लागत बढ़ेगी। गृह‑ऋण ब्याज दरें, जो रेपो दर के साथ तालमेल रखती हैं, 15–20 आधार अंक तक बढ़ सकती हैं, जिससे नए उधारकर्ताओं के मासिक किस्तों पर अतिरिक्त भार पड़ेगा। फ्लोटिंग‑रेट ऋण वाले कॉर्पोरेट उधारकर्ताओं
प्राथमिक स्रोत एवं आधिकारिक दस्तावेज़
- RBI likely to raise repo rate in October 2026 as West Asia crisis fuels inflation risks
- RBI likely to raise rates: Why inflation, crude and global rates matter – The Indian Expre
- Experts poll: RBI may increase rates by 0.25 pc in Oct policy amid inflationary pressures
- RBI may hike repo rate to 5.5% by 25 bps amid inflation – Deccan Herald